Do Hindi Films on Ventilator?
क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गयी हैं ? जब राजनीतिक पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत एजेंडे से ऊपर उठ कर इस गम्भीर विषय पर संवाद करेंगे तो कुछ अच्छा परिणाम निकलेगा . फ़िल्म जगत में प्रयोगात्मक फ़िल्मों के माध्यम से कार्यरत कवि, कथाकार , उम्दा निदेशक पवन कुमार से कल एक लम्बी बातचीत हुई विषय सामयिक था क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गई हैं . इस मंथन से कई महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आए , सोचा अन्य मित्रों के साथ साझा कर लूँ : 1. फ़िल्म की सफलता या विफलता के लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि यह एक बड़ी टीम का सामूहिक प्रयास होता है . 2. फ़िल्म की आत्मा उसकी कहानी है अगर अच्छी कहानी नहीं होगी तो फ़िल्म भले ही पैसा कमा ले लेकिन उससे समाज का कोई भला नहीं होने वाला है . इन दिनों एक फ़िल्म या OTT शृंखला की कहानी एक नहीं दस दस लोग मिल कर लिखते हैं फिर भी कहानी नज़र नहीं आती . 3.आजकल फ़िल्में सम्पन्न NRIs या फिर महानगरों में रहने वाले मल्टीप्लेक्स दर्शकों के हिसाब से बनायी जाती हैं जो असली भारत की समस्याओं से ठीक ठीक वाक़िफ़ नहीं हैं . NRIs ...