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Do Hindi Films on Ventilator?

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क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गयी हैं ? जब राजनीतिक पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत एजेंडे से ऊपर उठ कर इस गम्भीर विषय पर संवाद करेंगे तो कुछ अच्छा परिणाम निकलेगा . फ़िल्म जगत में प्रयोगात्मक फ़िल्मों के माध्यम से  कार्यरत कवि, कथाकार  , उम्दा निदेशक पवन कुमार से कल एक लम्बी बातचीत हुई विषय सामयिक था क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गई हैं . इस मंथन से कई महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आए , सोचा अन्य मित्रों के साथ साझा कर लूँ : 1. फ़िल्म की सफलता या विफलता के लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि यह  एक बड़ी टीम का सामूहिक प्रयास होता है . 2. फ़िल्म की आत्मा उसकी कहानी है अगर अच्छी कहानी नहीं होगी तो फ़िल्म भले ही पैसा कमा ले लेकिन उससे समाज का कोई भला नहीं होने वाला है . इन दिनों एक फ़िल्म या OTT शृंखला की कहानी एक नहीं दस दस लोग मिल कर लिखते हैं फिर भी कहानी नज़र नहीं आती .  3.आजकल फ़िल्में सम्पन्न NRIs या फिर महानगरों में रहने वाले मल्टीप्लेक्स दर्शकों के हिसाब से बनायी जाती हैं जो असली भारत की समस्याओं से ठीक ठीक वाक़िफ़ नहीं हैं . NRIs ...

Blackberries: Loads of Health Benefits

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Blackberries  These days, while I go for morning walk thorny bramble bushes on both side of walkway loaded with ripen blackberries draw attention . Very very tempting, I pick up a bunch of blackberries and eat every day during August and September.  Originally native to Europe, it has traveled world over. The farmers grow them across the United States all year round. They come from brambles, which are a type of thorny bush , here in Seattle area spread everywhere organically without any human intervention. In the month of August and September one should be ready to pick the ripen berries in his neighborhood.  Consumption of blackberries helps in improving health in many ways. It is a very rich source of  a high level of vitamin C helping body to produce collagen and certain neurotransmitters.  Blackberries contain high levels of antioxidants, such as anthocyanins. Antioxidants help people to fight against the adverse impact of free radicals in the body. Blackber...

हिंदी फ़िल्मों को गरियाना बंद होना चाहिए

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हिंदी फ़िल्में  आजकल हमारे देश में सबसे बड़ा pasttime बालिवुड यानी हिंदी फ़िल्मों को गरियाना हो गया है . जैसे देश में महंगाई , बेरोज़गारी , ग़रीबी से लेकर अश्लीलता , नंगेपन , सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास के लिए यही उत्तरदायी हैं . एक बात और , इन दिनों दक्षिण की फ़िल्मों को महिमा मंडित करने का भी ज़बरदस्त प्रयास चल रहा है , तुलना का भाव ऐसा है जैसे बॉलीवुड नौटंकी में नाच करने वाली हो और दक्षिण भारतीय फ़िल्में संस्कारी बहु हों . यह सब खेल Twitter और WhatApp पर ज़बरदस्त चल रहा है , किसी भी फ़िल्म या कलाकार के लिए बायकाट के लाखों tweets और WhatsApp संदेश घूमने लगते हैं.  पिछले पचास साल से मैं फ़िल्मों का दीवाना रहा हूँ हालीवुड, हिंदी फ़िल्में , हिंदी इतर भारतीय भाषाओं की फ़िल्में, ईरानी , श्रीलंकाई, इटैलियन, फ़्रेंच यहाँ तक की कम्बोडिया की फ़िल्म् खूब देखीं हैं . ढेर सारे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव भी देखे , MAMI के शुरुआती दौर में जुड़े यहाँ तक कि उनकी डेली बुलेटिन तक निकाली . रिलायंस द्वारा इसे घोर व्यावसायिक बनाने के बाद इससे रिश्ता कमजोर पड़ गया . फ़िल्मों के लिए इसी दीवानेपन...

क़ुल्फ़ी और आम की आइसक्रीम की अमेरिका में दस्तक

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क़ुल्फ़ी और आम की आइसक्रीम की अमेरिका में दस्तक  ठंडे देशों में पूरे साल आइसक्रीम खायी जाती है . आप यह भी कह सकते हैं कि पाश्चात्य देशों में हर मौसम में आइसक्रीम भोजन के बाद खाए जाने वाले मीठे का हिस्सा रहती है . लेकिन भारत में आइसक्रीम के जो स्वाद मिलते हैं वे अब से कुछ साल पहले तक अमेरिका में अधिकांश लोगों को  पता नहीं थे .  कुछ ही वर्ष पूर्व मेगा स्टोर चेन COSTCO ने अमेरिका में भारतियों की पहली पसंद मलाई  क़ुल्फ़ी और पिश्ता क़ुल्फ़ी बेचने की शुरुआत की थी , जिससे  क़ुल्फ़ी भी आइसक्रीम के मुक़ाबले में आ गयी . COSTCO की देखा-दाखी भारतीय मूल के लघु उद्दयमियों ने भी क़ुल्फ़ी बनानी शुरू कर दी है कल मैंने अपने मित्र दोषी जी के साथ सम्मामिश फ़ार्मर मार्केट में बांसुरी ब्रांड की मलाई क़ुल्फ़ी खाई , स्वाद और ठंडक में भारतीय क़ुल्फ़ियों के काफ़ी क़रीब लगी , स्टाल पर लम्बी क़तार लगी हुई थी .  लेकिन अब कुछ उद्दयमियों ने आइसक्रीम में भी भारतीय फ़्लेवर के प्रयोग करने शुरू कर किए हैं उनमें से प्रमुख फ़िलाडेल्फ़िया की कम्पनी फ़्रुटेरो है . इसके स्वामी माइक और वेदांत साबू...

सोच के तीन महाद्वीप

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इंसान   का   सोच   बहुत   कुछ   उसके   परिवेश  ,  परम्परा  ,  जलवायु   पर   निर्भर   करता   है  .  लेकिन   अगर   वो   मान   ले   कि   उससे   बेहतर किसी   और     दूसरा   सोच   नहीं   है   तो   यह   अपरिपक्वता   के   अलावा   कुछ   भी   नहीं   होगा   क्योंकि   इसका   एक   अर्थ   यह   भी   है   कि उसने   दुनिया   नहीं   देखी   है   वह   अपने   ही     बनाए   हुए   दायरे   में   क़ैद   है  .  इसलिए   इंसान   को   अपने   जीवन   में   जहां   तक   सम्भव   हो घूमना   फिरना   चाहिए   ताकि   जगह   जगह     की   संस्कृति  ,  लोक   परम्पराओं  ,  भोजन   की   आदतों   को  ...