सोच के तीन महाद्वीप
इंसान का सोच बहुत कुछ उसके परिवेश , परम्परा , जलवायु पर निर्भर करता है . लेकिन अगर वो मान ले कि उससे बेहतरकिसी और दूसरा सोच नहीं है तो यह अपरिपक्वता के अलावा कुछ भी नहीं होगा क्योंकि इसका एक अर्थ यह भी है किउसने दुनिया नहीं देखी है वह अपने ही बनाए हुए दायरे में क़ैद है . इसलिए इंसान को अपने जीवन में जहां तक सम्भव होघूमना फिरना चाहिए ताकि जगह जगह की संस्कृति , लोक परम्पराओं , भोजन की आदतों को देखने और परखने काअवसर मिले अपना worldview बेहतर बनेगा . मेरे एक मित्र हैं राकेश माथुर वे लन्दन में रहते हैं और हर महीने में किसीएक देश घूम आते हैं , वहाँ के शहरों में पब , कैफ़े , रेस्तराँ , संग्रहालय , पुस्तकालय , सड़कें नापते हैं और लोगों से संवादकरते हैं . उनके पास बैठो तो आपके सामने अनुभवों की पोटली खुलनी शुरू हो जाती हैं.
पाँच महाद्वीपों में से तीन महाद्वीपों और कुछ छोटे द्वीपों में रहने का मुझे भी अवसर मिला है . जिन तीन महाद्वीपों में रहा वेभौगोलिक रूप से ही नहीं सोच के भी महाद्वीप हैं .
बात एशिया से शुरू करते हैं , यह बहुत विशाल महाद्वीप है सभ्यता संस्कृति का चेतन स्वरूप , भारत इसका उप महाद्वीपहै जहां दुनिया के तीन बड़े धर्मों का उद्भव यहीं हुआ है , भारत से ज़मीनी रास्ते को पकड़ कर येरुशलम और मक्का मदीनातक पहुँच जाओ तो आप अब्रह्मिक धर्म यानी यहूदी , ईसाई और मुस्लिम मतों के उद्गम स्थल तक पहुँच सकते हैं . भारतमें जन्मे और पल्लवित बौद्ध और हिंदू धर्म भारत की सीमा से बहुत दूर दूर तक फैले लेकिन बाहुबल या तलवार के सहारेनहीं , धर्म प्राण संत और अन्वेषकों के माध्यम से. आज हालत कुछ ऐसी है की भारत से कहीं ज़्यादा लोग जापान , चीन, विएतनाम , कम्बोडिया, इंडोनेशिया , मलेशिया , बर्मा , थाईलैंड , मंगोलिया में बौद्ध धर्म को मानते हैं , यही नहीं प्राचीनहिंदू परम्परा भी कमोबेश इन सभी देशों में है , दुनिया का सबसे बड़ा उपासना स्थल अंकोर वाट जो भगवान विष्णु कोसमर्पित है कम्बोडिया में है . इंडोनेशिया , मलेशिया की आबादी का बड़ा हिस्सा अब इस्लाम को मानता है लेकिन वे लोगसांस्कृतिक रूप से अभी भी भारतीय मान्यताओं और परम्पराओं से जुड़े हैं . इस्लाम शुरुआत के वर्षों में व्यापारियों औरसंतों के ज़रिए इस्लाम एशिया के अरब रेगिस्तानों से निकल कर अफ़्रीका तक गया , लेकिन यह भी सच है कि मूलतः यह राजशाही की तलवारों के साये में फैला. चीन भी एशिया का ही भाग है जहां लाओत्से , कंफ्यूशियस जैसे चिंतक हुए , बौद्ध धर्म भी वहाँ व्यापक रूप से अपनाया गया . साम्यवाद के उद्भव के बाद वहाँ धर्म को अलविदा कह दिया था , हाल हीके वर्षों में उसने ज़बरदस्त आर्थिक समृद्धि हासिल की है और सामरिक दृष्टि से दुनिया का बड़ा ताकतवर देश बन गया हैउसका एक मात्र कारण धर्म विमुखता मात्र नहीं है, चीन एक सटीक सोच वाला इलाक़ा है उसके बारे में अलग से औरकाफ़ी विस्तार से लिखा जा सकता है.
यूरोपीय महाद्वीप की बात करें तो वहाँ यहूदी और ईसाई धर्म ख़ूब गला फूला. जब से योरोप ने समुद्र में नेविगेशन मेंमहारथ हासिल की वे दूर दराज व्यापार करने के साथ के साथ ही अपनी धर्म पताका भी ले कर निकल पड़े थे. उन्होंनेअन्य महाद्वीपों में व्यापार , शासन और धर्म का घालमेल करके स्थानीय प्राचीन धर्मों , संस्कृतियों और परम्पराओं कोरौंदने और अपनी शैली आरोपित करने की कोशिश की . पर वहाँ आज स्थिति कुछ इस तरह बदली है कि आज ईसाइयोंके धर्मगुरु पोप जब कनाडा जाते हैं तो वहाँ के मूल निवासियों के साथ मिशनरियों द्वारा किए गए अत्याचार के लिए क्षमायाचना करने में गुरेज़ नहीं करते.
सोच के महाद्वीप की बात जब हम करते हैं तो पाते हैं कि जो महाद्वीप धार्मिक रूप से अधिक प्राणवान बने रहे हैं वे विज्ञान , तकनीक और भौतिक तरक़्क़ी की दौड़ में कहीं पीछे छूट गए , समझ नहीं आता कि धर्म वैज्ञानिक और तकनीकीतरक़्क़ी में कैसे बाधक बन जाता है शायद धर्म की अति आदमी को अधिक भाग्यवादी बना देती है . यह बात यूरोप केमामले में तो बिल्कुल सटीक लगती है क्योंकि वहाँ सत्रहवीं शताब्दी तक धर्म अगली सीट पर था और वैज्ञानिक सोच कीबात करने वालों को मृत्यु दंड तक झेलना पड़ा था , जैसे ही धर्म पिछली सीट पर आया वहाँ तरक़्क़ी की रफ़्तार तेज होगयी. लेकिन यूरोप में एक अच्छी बात यह हुई है कि वैज्ञानिक तरक़्क़ी के साथ हाई साथ उसने अपनी कला, संस्कृति औरपरम्पराओं को भी बड़े जतन से सहेजा हुआ है .आज यूरोप में भव्य चर्च ज़रूर हैं लेकिन मास में युवा लोग नज़र नहीं आते. जिन यूरोपीय देशों ने लोकतंत्र को अपनाया और अपनी कार्य-संस्कृति को समावेशी बनाया उनके पास प्रतिभा की कमीनहीं रही , यही नहीं उनमें से कई ने अपने राजनीतिक धरातल को भी समावेशी बनाया है , आयरलैंड के प्रधान मंत्री आधेमराठी हैं , क्या पता भारतीय जड़ों वाले वाले ऋषि सोनक ब्रिटेन के प्रधान मंत्री बन जाएँ क्योंकि वे इस दौड़ में काफ़ी आगेचल रहे हैं . पुर्तगाल के प्रधानमंत्री का गोवा कनेक्शन है . आज के यूरोप में लोगों को अपने भोजन के साथ दूसरे देशों केखाने से कोई गुरेज़ नहीं है , हर शहर में थाई, चाइनीज़ , भारतीय , लेबनानी , ईथियोपियाई रेस्टोरेंट मिल जाएँगे . चिकनटिक्का मसाला ब्रिटेन की राष्ट्रीय डिश बन चुका है लेकिन इस सब से वहाँ के लोगों को कोई परेशानी नहीं है . लन्दन मेंयह हाल है कि हर बड़े स्टोर में एक दो आइल ऐसे ज़रूर होते हैं जो भारतीय दालें , चावल , आटा, मसाले सजे रहते हैं.
सोच का एक महाद्वीप अमेरिका है . यह दुनिया का एक मात्र ऐसा समृद्ध लोकतांत्रिक देश है जिसके नागरिकों का कोईस्वर्णिम अतीत नहीं है . ज़्यादातर आबादी प्रवासियों की है और दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसके लोग यहाँनहीं हों. ये सब अमेरिका में एक हसीन भविष्य का सपना ले कर आते हैं , अपने हुनर और मेहनत से अपने आर्थिक औरसामाजिक स्तर को अपने मूल देश से कहीं बेहतर बना लेते हैं , उनकी उद्यमशीलता का सीधा सीधा लाभ अमेरिका को भीमिल रहा है . आबादी का बड़ा हिस्सा ईसाई है लेकिन सरकार किसी क़िस्म के धर्म को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं रखती है , सालाना अवकाश बहुत कम हैं जो धार्मिक पर्वों से नहीं जुड़े हैं . यहाँ कई मतों के चर्च हैं लेकिन चर्च आने वालों की संख्याघटती जा रही है . दूसरी तरफ़ मंदिर और मस्जिद बनाने के प्रयासों में तेज़ी आयी है. अमेरिकी महाद्वीप के दक्षिणी हिस्सेके देशों में लोकतंत्र बहुत हाई कमजोर क़िस्म का है कई देशों में सत्ता पर वहाँ की फ़ौज का छोटा मोटा जरनल क़ाबिज़ होजाता है , इन सत्ताओं की आम आदमी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है, निरंकुश सत्ताएँ ड्रग्स के व्यापार में लगी हुई हैं . कुल मिला तस्वीर यह उभरती है की लोकतंत्र अपनी तमाम ख़ामियों के वावजूद सत्ता पर निरंकुश शासकों को हावी नहींहोने देता और अगर सिरफिरे नायक कोशिश करते भी हैं तो देर सवेर से लोग नकार देते हैं .
बात हमने शुरू की थी सोच के तीन महाद्वीपों से , एक वह जहां लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रधानता दी जाती है वो अपनीतमाम ख़ामियों के वावजूद नागरिकों के लिए एक बेहतर जीवन का अवसर प्रदान करते हैं उससे वैज्ञानिक खोजबीन औरस्वतंत्र चिंतन को बढ़ावा मिलता है . सोच का दूसरा महाद्वीप वह है जहां हर चीज़ पर धर्म हावी है , वहाँ केवल वही सचमाना जाता है जो धार्मिक मान्यताओं या फिर धार्मिक पुस्तकों के अनुरूप हो बाक़ी कुफ़्र है ! सोच का तीसरा महाद्वीप उनलोगों से बनता है जो अपने जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए काम करते हैं उनके लिए उनका काम ही उनका धर्म है। , ऐसेसमाज में सामूहिक प्रयास से एक बेहतर ज़िंदगी का ईको सिस्टम तैयार होता है . इन तीनों के अपने गुण हैं कोई भीपूर्णतः ग्राह्य या त्याज्य नहीं है .
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