Do Hindi Films on Ventilator?

क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गयी हैं ?
जब राजनीतिक पूर्वाग्रहों और व्यक्तिगत एजेंडे से ऊपर उठ कर इस गम्भीर विषय पर संवाद करेंगे तो कुछ अच्छा परिणाम निकलेगा . फ़िल्म जगत में प्रयोगात्मक फ़िल्मों के माध्यम से  कार्यरत कवि, कथाकार  , उम्दा निदेशक पवन कुमार से कल एक लम्बी बातचीत हुई विषय सामयिक था क्या हिंदी फ़िल्में वेंटिलेटर पर चली गई हैं . इस मंथन से कई महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर आए , सोचा अन्य मित्रों के साथ साझा कर लूँ :
1. फ़िल्म की सफलता या विफलता के लिए किसी एक व्यक्ति को ज़िम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि यह  एक बड़ी टीम का सामूहिक प्रयास होता है .
2. फ़िल्म की आत्मा उसकी कहानी है अगर अच्छी कहानी नहीं होगी तो फ़िल्म भले ही पैसा कमा ले लेकिन उससे समाज का कोई भला नहीं होने वाला है . इन दिनों एक फ़िल्म या OTT शृंखला की कहानी एक नहीं दस दस लोग मिल कर लिखते हैं फिर भी कहानी नज़र नहीं आती . 
3.आजकल फ़िल्में सम्पन्न NRIs या फिर महानगरों में रहने वाले मल्टीप्लेक्स दर्शकों के हिसाब से बनायी जाती हैं जो असली भारत की समस्याओं से ठीक ठीक वाक़िफ़ नहीं हैं . NRIs तो हिंदी फ़िल्में नॉस्टैल्जिया और मज़े  के लिए देखते हैं वे एक हिंदी फ़िल्म देखने के लिए प्रति व्यक्ति दो हज़ार रूपये देते हैं . सोच कर देखिए क्या पिछले दस पंद्रह सालों में दो बीघा ज़मीन या फिर मदर इंडिया जैसे ज़मीन से जुड़े कथानकों पर कोई फ़िल्म बनी हो . इस क़िस्म की फ़िल्म देखने वाला दर्शक वर्ग क़स्बों और गाँव में बसता है वो फ़िल्म सिंगल हाल में देखता है जहां आज भी टिकट चालीस रूपये के आस पास है , वहाँ से इतना कलेक्शन नहीं हो पाता की गिलम बनाने वाला  फ़िल्म के सोच बिंदु में उस दर्शक वर्ग को रखे.
4.फ़िल्म का उद्देश्य मनोरंजन करना तो है ही साथ ही समाज को सही रास्ता दिखाना भी है . ऐसी बहुत सारी फ़िल्में आयी हैं जिनमें शिक्षा जैसे विषयों पर गम्भीर सवाल उठाए गए थे उदाहरण के लिए “तारे ज़मीन पर “, “पाठशाला”, “थ्री ईडियट्स” जिन्होंने नीति नियामकों तक को सोचने पर विवश किया. 
5.इन दिनों स्टार  सिस्टम को  ख़ूब गरियाया जा रहा है , यह नहीं भूलना चाहिए  अस्सी के दशक में जब बड़े नामचीन कलाकारों की बेसिर पैर की फ़िल्म फ़्लॉप हुईं , अचानक साधारण चेहरे मोहरे वाले , चेचक के निशान वाले ओमपुरी, अमरीश पूरी , नसरुद्दीन शाह , गिरीश करनाड, नाना पाटेकर जैसे कलाकार “जाने भी दो यारों”, “अर्थ”, “अर्ध सत्य” , “स्वामी” जैसी फ़िल्मों के माध्यम से दर्शकों के दिलों पर छा गए . ये वे कलाकार थे जिन्हें किसी परिवार या फिर प्रोडक्शन हाउस ने प्रमोट नहीं किया था . 
6.सम्वेदनशील राजनीतिक विषयों पर पहले भी ख़ूब फ़िल्में बनी थीं लेकिन उनमें किसी ख़ास विचारधारा या फिर पक्ष की बात को प्रमोट नहीं किया गया था, “हकीकत”, “आँधी” सत्ता के तौर तरीक़ों पर सवाल उठाती थीं फिर भी रिलीज़ हुईं . सांप्रदायिकता और हिंदू मुसलमान जैसे विषय पर बीआर चोपड़ा की फ़िल्म “धर्मपुत्र” आज की तारीख़ में बनाने की बात कोई निर्माता सोचेगा भी नहीं .
7.इन दिनों फ़िल्मों के बजट आसानी से सौ करोड़ को छू रहे हैं लेकिन फिर भी अपनी लागत वसूल नहीं कर पास रही हैं , अगर सुपर स्टार की फ़ीस और भव्य लोकेशन को लागत से घटा दो तो उसी बजट में पंद्रह फ़िल्में बन सकती हैं और निश्चय ही उनमें से कुछ तो बेहतरीन क़िस्म की होंगी. 
दुर्भाग्य यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग, फ़िल्म निर्माण के स्टेक होल्डरों , पत्रकारों ने इस विषय पर चर्चा और संवाद बंद कर दिया है. अगर संवाद का सिलसिला वापस नहीं शुरू हुआ तो स्थिति और गम्भीर होती चली जाएगी . इसलिए संवाद के इस सिलसिले को और आगे बढ़ाया जाएगा.


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