हिंदी फ़िल्मों को गरियाना बंद होना चाहिए
हिंदी फ़िल्में
आजकल हमारे देश में सबसे बड़ा pasttime बालिवुड यानी हिंदी फ़िल्मों को गरियाना हो गया है . जैसे देश में महंगाई , बेरोज़गारी , ग़रीबी से लेकर अश्लीलता , नंगेपन , सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास के लिए यही उत्तरदायी हैं . एक बात और , इन दिनों दक्षिण की फ़िल्मों को महिमा मंडित करने का भी ज़बरदस्त प्रयास चल रहा है , तुलना का भाव ऐसा है जैसे बॉलीवुड नौटंकी में नाच करने वाली हो और दक्षिण भारतीय फ़िल्में संस्कारी बहु हों . यह सब खेल Twitter और WhatApp पर ज़बरदस्त चल रहा है , किसी भी फ़िल्म या कलाकार के लिए बायकाट के लाखों tweets और WhatsApp संदेश घूमने लगते हैं.
पिछले पचास साल से मैं फ़िल्मों का दीवाना रहा हूँ हालीवुड, हिंदी फ़िल्में , हिंदी इतर भारतीय भाषाओं की फ़िल्में, ईरानी , श्रीलंकाई, इटैलियन, फ़्रेंच यहाँ तक की कम्बोडिया की फ़िल्म् खूब देखीं हैं . ढेर सारे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव भी देखे , MAMI के शुरुआती दौर में जुड़े यहाँ तक कि उनकी डेली बुलेटिन तक निकाली . रिलायंस द्वारा इसे घोर व्यावसायिक बनाने के बाद इससे रिश्ता कमजोर पड़ गया .
फ़िल्मों के लिए इसी दीवानेपन के कारण फ़िल्म समीक्षक का लबादा भी ओढ़ा ताकि फ़िल्में देखने का सिलसिला कम न हो.
अपने अनुभव के आधार पर कुछ बिंदु साझा कर रहा हूँ :
कोई भी फ़िल्म किसी एक कलाकार या फिर प्रोड्यूसर की बपौती नहीं होती है , इसमें हज़ारों लोगों का खून पसीना और टैलेंट शामिल होता है . फ़िल्म चलेगी या नहीं इसका फ़ैसला केवल और केवल दर्शक ही कर सकता है. यह बात हिंदी फ़िल्मों के लिए ही नहीं दुनिया भर की सभी भाषाओं की फ़िल्मों पर लागू होती है . भूतकाल में भी जो हिंदी फ़िल्में बनती थीं उनमें सभी की सभी स्तरीय नहीं होती थीं , दर्शक घटिया फ़िल्मों को उस समय भी नकार देते थे , आज जो हमें आपको जो भी पुरानी फ़िल्में याद हैं वे हर साल बनने वाली फ़िल्मों में से कुछ ही हैं .
फ़िल्मों के विषय अंतरिक्ष या फिर शून्य से नहीं आते , फ़िल्म या तो किसी नई पुरानी कहानी पर आधारित होती है ( इसके किसी अन्य भाषा की सफल फ़िल्म की कथा भी शामिल हो सकती है ) कई बार यह समाज में जो कुछ चल रहा है इन परिस्थितियों या फिर घटनाओं पर आधारित हो सकती हैं . समाज की विसंगतियों पर चुटकी लेने से कोई भी धर्म ख़तरे में नहीं आ जाएगा . आपको क्या देखना है क्या नहीं आप को ही तय करना है लेकिन सबका ठेका आपने या मैंने नहीं ले रखा है. हर कलाकार या प्रोडक्शन हाउस या इंडिपेंडेंट प्रोड्यूसर की हर फ़िल्म अच्छी नहीं होगी जो अच्छी होती है उसे जनता एक बार नहीं कई बार देखती है घटिया फ़िल्म में हाल ख़ाली रहते हैं.
जो लोग बालीवुड पर अश्लीलता का आरोप लगा रहे हैं उन्होंने सम्भवत: ठीक से भोजपुरी या फिर दक्षिण भारतीय फ़िल्में नहीं देखी हैं . हालीवुड की फ़िल्मों, विदेशी सीरियल की अश्लीलता , नंगापन हमें दिखाई नहीं देता जिन्हें एक नहीं दसियों चैनल दिन रात परोस रहे हैं जिनकी बात कोई नहीं करता है उनसे हमारी संस्कृति को कोई ख़तरा नहीं लगता है . माफ़ कीजिए आप में से किसी ने अपने दोस्तों द्वारा WhatsApp समूहों और इंटरनेट पर परोसे जाने वाले निकृष्ट और अश्लीलता से सने क्लिपिंग के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठायी है जिनको बालीवुड को संस्कारी बनाने की माँग कर रहे अंकल लोग बड़ी रुचि लेकर देखते है .
यह कह कर मैं हिंदी फ़िल्मों का पक्ष नहीं ले रहा हूँ , यहाँ भी आत्मलोचन की बहुत ज़रूरत है . घिसे पिटे विषयों की जगह नए विषय , बेहतर कहानी कहने की शैली आनी ही चाहिए , अभिनय में नए चेहरों की भी ज़रूरत है . लेकिन फ़िल्म बनने में बहुत पैसा लगता है , जहां हर निर्माता का पहला लक्ष्य लगे इन्वेस्टमेंट को वसूलना भी होता है इसलिए वे बड़े नामचीन चेहरों और सुरक्षित गारण्टीशुदा फ़ार्मूलों को आज़माते हैं , इस दुश्चक्र से हिंदी फ़िल्मों को धीरे धीरे बाहर निकलना ही होगा.
एक और बात याद रखने की है हिंदी फ़िल्में हिंदी भाषियों की बपौती नहीं हैं इनके साथ बहुत सारे क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदीतर प्रांतों के लोग भी जुड़े हुए हैं जो इसकी सबसे बड़ी ताक़त भी है . शायद यही कारण है कि हिंदी फ़िल्में ही पूरे देश भर में चलती हैं, ग़ैर-हिंदी भाषियों का हिंदी फ़िल्मों का हिस्सा होना इन फ़िल्मों को समावेशी कलेवर प्रदान करता है , यही नहीं भारत की सीमाओं से परे दूर दराज के देशों में भी पसंद किए जाने का सीक्रेट भी यही है .
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