Hindi Ghazal हिंदी ग़ज़ल - मैं रेत की मानिंद हूँ
मैं रेत की मानिंद हूँ मैं रेत की मानिंद हूँ मुठ्ठी से फिसल जाऊँगा छू के तू अगर गुजरे फाल्गुन सा महक जाऊँगा तू रोकने निकला है ज़रा रोक के रखना मैं वक्त का दरिया हूँ तेरे हाथ न आऊँगा तूफ़ान में ले आया है क्या सोच के नाविक तू अपनी फ़िकर करना मैं तैर के बच जाऊँगा दिखने में भले लगता हूँ हिमनद का ठिकाना आग़ोश में जो लेगा चुपचाप पिघल जाऊँगा तू बांधने निकला है मुझे क्या सोच के नादाँ मैं धार हूँ नदिया की तेरे ...