Hindi Ghazal हिंदी ग़ज़ल - मैं रेत की मानिंद हूँ
मैं रेत की मानिंद हूँ
मैं रेत की मानिंद हूँ मुठ्ठी से फिसल जाऊँगा
छू के तू अगर गुजरे फाल्गुन सा महक जाऊँगा
तू रोकने निकला है ज़रा रोक के रखना
मैं वक्त का दरिया हूँ तेरे हाथ न आऊँगा
तूफ़ान में ले आया है क्या सोच के नाविक
तू अपनी फ़िकर करना मैं तैर के बच जाऊँगा
दिखने में भले लगता हूँ हिमनद का ठिकाना
आग़ोश में जो लेगा चुपचाप पिघल जाऊँगा
तू बांधने निकला है मुझे क्या सोच के नादाँ
मैं धार हूँ नदिया की तेरे से न रुक पाऊँगा
यह दिल तो मेरा अब भी बच्चे की तरह है गा
कोशिश जो करेगा जल्दी ही बहल जाऊँगा
सदियों के अंधेरे में सदियों के उजालों में
डूबा जो कभी उनमें फिर लौट नहीं पाऊँगा
तू खूंरेज है ज़ालिम है यह सब को पता है
क्या तुझको लगे है इतने से मैं डर जाऊँगा
-प्रदीप गुप्ता
Comments
Post a Comment