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IN CASE YOU WANT TO REBRAND YOUR PRODUCT

When considering a re-branding activity, the first question that the brand custodian should ask is “does the brand require a re-launch at all”. If yes then what is/are one or more compelling reasons for the re-launch? Stating the objectives for re-launch before hand is very important and needs to be kept in mind throughout the process of redesigning. Also, every identity has certain key elements which are central to the core brand idea. It is important to identify and preserve the same to ensure that the connect, especially with core consumers remains intact. The first thing to identify while re-branding, is the new brand goal and identity. Every brand has certain relationship with the consumer and it has often many alternatives within and outside the category. The world of the consumer is constantly changing. Their beliefs, their thoughts, their preferences, their lifestyle is constantly evolving. Any deep rooted brand has to keep a constant tab on these aspects and has to adapt ...

ghazal : aap gar hamraah hon

आप गर हम-राह हों तो दूरियां    कुछ  भी नहीं.  चल पड़े हों  मंजिलें दुश्वार इतनी भी नहीं    लाख कोशिश कीं ज़माने ने झुकाने की मुझे  भीड़ मे हूँ  भीड़ का हूँ  भीड़ सा फिर  भी  नहीं  जिन्दगी ले आयी हमको साथ ऐसे मोड़ पर  फैसला करना है मुश्किल क्या गलत है क्या सही . हादसों के खौफ से चुप रहोगे कब तलक  खोल दरवाजे घरों के साथ निकलो तो सही  साथ छूटा यों  अचानक रास्ते में हमसफ़र  और ज्यादा साथ चलना अपनी किस्मत में नहीं  तुम मुक्कम्मिल नज़्म हो और हर अदा अशार  है गुनगुना सकता हूँ तुमको प्यार से देखो तो सही. मंजिलें खुद ही निकट आ जाएंगी  राह को थाम लो मिल के चलो तो सही                     _ प्रदीप गुप्ता @                            

ghazal : वो गया वक्त अचानक से याद आया होगा तेरा एहसास ही मुझे खींच के लाया होगा

वो गया वक्त  अचानक  से याद आया होगा  तेरा एहसास ही  मुझे  खींच के  लाया होगा लोग       मिलते हैं और जुदा  हो जाते हैं  पर यह मंजर अलग सा नज़र आया होगा साथ जब दिन के उजाले ने कहीं  छोड़ दिया  रास्ता जुगनुओं ने  ही  दिखाया  होगा  कितने दिन रात लगे होंगे भुलाने में मुझे  टूटे ख़्वाबों ने तुझे  भी तो  सताया   होगा  प्यार तो प्यार है बच्चों का कोई खेल नहीं   हादसों ने  ये सबक उसको सिखाया होगा   उठाये  होंगे जब दुआ में अपने हाथ     ख्याल मेरा कभी भूले से जो आया होगा      
दर्दे दिल की दवा कीजिये  आप फिर मुस्करा दीजिये  फूल भेजा है ख़त की तरह  होठ से बस लगा लीजिये  पांव नाजुक हैं जल जायेंगे  धूप  में न चला कीजिये   उम्र की प्यास बुझ जायेगी  आँख से गर पिला दीजिये  चलते चलते खो गए रास्ते  मंजिलों की दुआ कीजिये दर्द बरसों रहा साथ में  इसको यूँ न जुदा कीजिये हम तो मिट जायेंगे ख़ाक में  लीजिये आजमा लीजिये  पूछता हूँ मैं  अपना पता  मुझको मुझसे मिला दीजिये  हाथ काँधे पे रखा है गर  जिन्दगी भर निभा लीजिये  इश्क करना है गर इक खता  प्यार से ही सज़ा दीजिये                   --------- प्रदीप गुप्ता @  

Ghazal : कई दिनों तलक बारिश में नहाई है धूप इसलिए कुछ और निखर आयी है धूप

मुद्दतों बाद खुल के निकल आई है धूप   इक गिलहरी की तरह आज इठलाई धूप  इस तरफ रेत है सीप हैं  समंदर है  लो फिर पसर क़र नहाई है धूप  उनके रुखसार पे गिर के जो फिसली  आज कुछ और निखर आयी है धूप  दौर मुश्किल के आते हैं चले जाते हैं  उफ़ क्या बारिश है  जो याद आई है धूप  सबके अपने दुःख दर्द हुआ करते हैं  अंधेरों से गुजर कर खिल आयी है धूप  कई दिनों तलक बारिश में  नहाई है धूप  इसलिए कुछ और निखर आयी है धूप                        - प्रदीप गुप्ता@

ghazal :दो चार पल जो साथ तेरे हम गुजार लें सारी उम्र यूँ ही शबे गम गुजार दें

दो चार पल जो साथ तेरे हम गुजार लें  सारी  उम्र यूँ ही शबे गम गुजार दें  दीवानगी ने हम को यह दिन भी दिखाना था  हर चेहरा तेरे जैसा समझ कर पुकार लें  ज़िंदा रहे रहे जो तुझे देखने के बाद  जो कुछ बची हो उम्र यूँही हम गुजार दें  आँखों ने कुछ कहा था , कहा कुछ भी नहीं अभी  यह जानने में उम्र यूँ ही हम गुज़ार लें  साथ चलना था चले अजनबी से हम  इस हादसे का बोझ चलो अब उतार लें  बाद मुद्दत के बिछड़ कर तेरा मिलना  इस ख्याल के साए में चलो दिन गुजार लें                                 - प्रदीप गुप्ता @  

देख के उसको घटा का खुल के बरसना यारों बारिश में निकलने का अंजाम यही होना था

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देख के उसको घटा का खुल के बरसना यारों  बारिश में निकलने का अंजाम यही होना था  दिल की बाज़ी तो जीत लेते मगर  गम के दरिया से पार होना था  छुपा के हाथ से होठों  को दबा कर हंसना  इसी अदा पे हमें जां निसार होना था  आँख से पी तो फिर पीते ही गए  तिश्नगी को भी कभी शर्मसार होना था   प्यास सदियों की और उम्र मिली लम्हों की  जिन्दगी को भी इतना दुश्वार होना था  धुप की तरह आस ने सीढीयाँ चढी उतरीं  वो न आया तो फिर से उदास होना था  वतन को छोड़ दिया जिस शख्स की खातिर हमने  दिल में रह जाएगा यह इमकान कहाँ होना था  ख्वाहिशें लाख लिए एक शख्स जिया करता था  कतरा कतरा बिखर के उसको फना होना था                                                                                  ...