Ghazal : कई दिनों तलक बारिश में नहाई है धूप इसलिए कुछ और निखर आयी है धूप
मुद्दतों बाद खुल के निकल आई है धूप
इक गिलहरी की तरह आज इठलाई धूप
इस तरफ रेत है सीप हैं समंदर है
लो फिर पसर क़र नहाई है धूप
उनके रुखसार पे गिर के जो फिसली
आज कुछ और निखर आयी है धूप
दौर मुश्किल के आते हैं चले जाते हैं
उफ़ क्या बारिश है जो याद आई है धूप
सबके अपने दुःख दर्द हुआ करते हैं
अंधेरों से गुजर कर खिल आयी है धूप
कई दिनों तलक बारिश में नहाई है धूप
इसलिए कुछ और निखर आयी है धूप
- प्रदीप गुप्ता@
इक गिलहरी की तरह आज इठलाई धूप
इस तरफ रेत है सीप हैं समंदर है
लो फिर पसर क़र नहाई है धूप
उनके रुखसार पे गिर के जो फिसली
आज कुछ और निखर आयी है धूप
दौर मुश्किल के आते हैं चले जाते हैं
उफ़ क्या बारिश है जो याद आई है धूप
सबके अपने दुःख दर्द हुआ करते हैं
अंधेरों से गुजर कर खिल आयी है धूप
कई दिनों तलक बारिश में नहाई है धूप
इसलिए कुछ और निखर आयी है धूप
- प्रदीप गुप्ता@
Comments
Post a Comment