ghazal : aap gar hamraah hon
आप गर हम-राह हों तो दूरियां कुछ भी नहीं.
चल पड़े हों मंजिलें दुश्वार इतनी भी नहीं
लाख कोशिश कीं ज़माने ने झुकाने की मुझे
भीड़ मे हूँ भीड़ का हूँ भीड़ सा फिर भी नहीं
जिन्दगी ले आयी हमको साथ ऐसे मोड़ पर
फैसला करना है मुश्किल क्या गलत है क्या सही .
हादसों के खौफ से चुप रहोगे कब तलक
खोल दरवाजे घरों के साथ निकलो तो सही
साथ छूटा यों अचानक रास्ते में हमसफ़र
और ज्यादा साथ चलना अपनी किस्मत में नहीं
तुम मुक्कम्मिल नज़्म हो और हर अदा अशार है
गुनगुना सकता हूँ तुमको प्यार से देखो तो सही.
मंजिलें खुद ही निकट आ जाएंगी
राह को थाम लो मिल के चलो तो सही
_ प्रदीप गुप्ता @
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