रवीन्द्र नाथ टैगोर की याद लंदन में

पूरे परिदृश्य को बदलने वाले युग पुरुष रविंद्र नाथ टैगोर की लंदन में याद ….
दो राष्ट्रों का राष्ट्र गान और एक देश के राष्ट्र गान की संकल्पना किसी एक ही व्यक्ति के खाते में हो , बात अविश्वसनीय सी लगती है . गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के लिखे हुए गीत भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगीत हैं और श्रीलंका का राष्ट्रगीत उन्ही की  प्रेरणा से शांतिनिकेतन में उनके शिष्य ने लिखा था . यही नहीं उनके द्वारा लिखा समग्र साहित्य , पेंटिंग और संगीत किसी एक व्यक्ति के जीवनकाल में लिखा जाना सम्भव नहीं लगता . बिना स्कूल कालेज में डिग्री हासिल किए हुए ललित कलाओं का एक विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय खड़ा कर देना गुरुदेव के बस की ही बात थी . साहित्य में गीतांजलि पर साहित्य का नोबल पुरस्कार अपने आप में आद्वित्य था क्योंकि इससे पूर्व किसी कविता संग्रह को नोबल नहीं मिला था. टैगोर ने दुनिया भर में अमेरिका से लेकर यूरोप , जापान, ईरान , दक्षिण पूर्व एशिया की कई यात्राएँ की थीं और उस दौरान वहाँ के राष्ट्राध्यक्षों, साहित्यकारों, चिंतकों , वैज्ञानिकों से संवाद किया था .उनके सोच का समाज राष्ट्रीयता की सीमा में बंधा नहीं था. ब्रिटिश हुकूमत ने उनकी साहित्यिक उपलब्धियों पर नाइटहुड प्रदान किया , लेकिन जालियाँवाला कांड से आहत होकर उन्होंने अपना यह टाइटिल वापस कर दिया . इस हिसाब से वे अवार्ड वापसी गैंग के पहले सदस्य थे .
उनके द्वारा बनाई संगीत रचनाएँ हर बांग्ला भाषी की अस्मिता बन चुकी हैं .
ऐसे महामना की याद में उनके १६१ वीं जयंती पर कल लन्दन के नेहरू सेंटर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया . उनकी रचनाओं पर नृत्य प्रस्तुति थीं जिनमें गांधी जी को पसंद रचना एक्का चलो रे ने विशेष रूप से आकृष्ट किया . गुरुदेव ने अर्जुन और चित्रांगदा को लेकर एक नृत्य नाटिका लिखी थी जो बहुत चर्चित हुई थी इसका मंचन भी आनंद गुप्ता की संस्था दक्षिणायन ने किया .
रविंद्र नाथ टैगोर के व्यक्तित्व  के एक हिस्से को उजागर करने वाली इस खूबसूरत संध्या का हिस्सा अन्य लोगों के साथ हाई बांग्लादेश के हाईकमिश्नर भी बनीं. नेहरू सेंटर के निदेशक अमीश त्रिपाठी ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य से ख़ूब तालियाँ बटोरीं …..






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