उम्र का असर Hindi Poetry

उम्र का असर अब दिखने लगा है 

थोड़ा चल के शरीर थकने लगा हैं 


मगर बहुत कुछ है जो मुझे आज भी 

बूढ़ा होने से रोकता है 

तेरी यादों का सिलसिला 

 के अक्सर झकझोरता  है 

पुलकित हो जाता है रोम रोम 

अजब सी ऊर्जा भर जाती है 

मायूसी पल भर में तेरी यादों से 

वाष्प बन कर उड़ जाती है


पहले उड़ता था उन्मुक्त पंछी जैसा 

अब अपने आप ही टिकने लगा है 


चंद दोस्त जब दूर से दिख जाते हैं 

कदम अपने आप उधर मुड़ जाते हैं 

वही उन्मुक्त अट्टहास वही शोख़ी 

उनके पुराने प्रहसन भी गुदगुदाते हैं 

मेरे ये दोस्त  टानिक से कम नहीं 

थके शरीर को नए उत्साह से भर देते हैं 

अजीब रिश्ता है मेरा उनके साथ 

बिना कहे वो मुझको समझ लेते हैं 



पर देख पाता हूँ उन दोस्तों का दर्द 

अब उनके चेहरे पे  छलकने लगा है 





टीवी मोबाइल  से ऊब होती है 

तो जा के किताबों में गुम जाता हूँ 

हर किताब से नया रिश्ता बनता है 

उसके साथ सफ़र पे निकल जाता हूँ 

कई बार जब कविताएँ पढ़ता हूँ 

उनके कई अंश मुझ पे ताने मारते हैं 

कई कहानियों में अपना अक्स लगता है 

बहुत से उपन्यास हालत के रोजनामचे हैं 


किताबों की दुनिया मैं तैरते तैरते 

एक नया सा शख़्स मुझमें बसने लगा है 

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