Aastha आस्था - हिंदी ग़ज़ल
आस्था
आस्था इतनी बदल ली , पानी पानी हो गयी
था तनिक सम्मान उनका , अब कहानी हो गयी
मोमबत्ती को जला के , उसने कहा सूरज है ये
एक बच्चे ने न माना बद-ज़ुबानी हो गयी
शाख़ से जब फूल को माली ने तोड़ा नोच कर
नाज़ था जिस पर उसे डाली बेगानी हो गयी
तन ढँका हो, सर पे छत , दो बखत की रोटियाँ
आज गर मिल जाए लगे है मेहरबानी हो गयी
वो करोना की तरह से अचानक ज़िंदगी में छा गया
जाते जाते जिस्म पर उसकी निशानी रह गयी
उनसे मिलना और बिछड़ना क्या कहें कैसे कहें
चंद अल्फ़ाज़ों में सिमट कर यह कहानी रह गयी
हम जो बच्चे थे हमें हर चीज़ दायम सी लगे थी
और अब इस उम्र में हर चीज़ फ़ानी हो गयी
Comments
Post a Comment