जब सुबह उठता हूँ contemporary Hindi Poetry

जब सुबह उठता हूँ 

जब सुबह उठता हूँ इन दिनों 

अजब सा हाल होता है 

कोई उम्मीद की किरण 

दिखायी नहीं देती .

इन दिनों दरवाज़ा कोई खटकाता नहीं 

कोई आहट भी सुनाई नहीं देती .

अब तो टीवी का स्क्रीन काला ही पसंद आने लगा है 

क्योंकि जब भी मैं टीवी खोल के देखता हूँ 

कोई अच्छी  खबर सुनाई नहीं देती . 

दोस्तों के फोन अब कम ही आते हैं 

और मैं डरने लगा हूँ 

उनको फ़ोन करने में , 

कुछ को किया तो वहाँ से आयी 

एक दिल तोड़ देने वाली अजनबी सी आवाज़ 

दोस्त की आवाज़ सुनाई नहीं देती 

शायद कभी सुनाई  दे) . 

कितने ही घरों  में 

हालत कुछ ऐसे बन चुके हैं 

हास्पिटल के लम्बे चौड़े बिल 

पूरी तरह परिवार की कमर तोड़ चुके हैं 

आपके घर में भाजी , दाल , चावल वग़ैरह 

भेजने वाले आपकी गली वाले अपने गल्ले में 

आप को चूना लगा के अतिरिक्त दौलत जोड़ चुके हैं.

स्कूल कालेज और विश्वविद्यालय बंद हैं 

दारू की दुकानों पे ज़बरदस्त क़तार है 

रोज़गार , काम धंधे बंद हैं 

सोशल  मीडिया पर ट्रैफ़िक बेशुमार  है 

वहाँ ऐसे लोगों की कमी नहीं 

जिनके दिमाग़ तकनीकी भाषा में कहें 

तो पूरी तरह प्रोग्रैम्ड हो चुके हैं 

उन्हें अपने जीवन की 

हर समस्या का हल दिखता है 

केवल भव्य इमारतें बन जाने से . 

पूरा कारोबार नफ़रत का दिखता है 

कुछ पल को तो ऐसा लगता है 

सच का कोई अर्थ ही नहीं है 

झूठ सिर्फ़ झूठ ही 

इस आभासी दुनिया में चलता है 

स्कूल , कालेजविज्ञान , तकनीक संस्थान 

किसी प्राथमिकता में नहीं लग रहे हैं 

झाड़ फूंक के नुस्ख़े 

विज्ञान बन के केमिस्ट के यहाँ सज रहे हैं 

लोग इस पूरे परिद्र्श्य में 

सकारात्मक तत्व खोज रहे हैं 

मैं भली भाँति जानता हूँ 

इस समय आप क्या सोच रहे हैं . 



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