साँसों में - हिंदी कविता Hindi Poetry

साँसों पर अब तो पहरा है 

अंधियारा कितना गहरा है 


कोई कुछ  बोल रहा है 

सन्नाटा बाहर पसरा है 


आइने में  खोज चुका हूँ 

इसमें नहीं मेरा चेहरा हैं 


कोई समझ नहीं पाया है 

क्यों  यह शहर हुआ बहरा है 


सहरा बीच  हमसे पूछे हैं 

कितनी दूर बचा सहरा है 


हालातों को कोस रहा हूँ  

जबकि दोष यहाँ मेरा है 


आभासी सपनों में जी कर 

लुटा पिटा सा घर तेरा है 



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