दायरा : हिंदी कविता Dayra Hindi Poetry

इन दिनों सिमट चुका हूँ 
एक अजीब से दायरे में 
जहां तक मैं महसूस कर पा रहा हूँ 
केवल मैं ही मैं हूँ , 
यहाँ तक कि मेरे साथ मेरा साया तलक़ नहीं है 
मैं हैरान हूँ कि मैं  अपने परिचितों की भीड़ में तो हूँ , 
मगर उनके होने का एहसास नहीं लगता 
वजह साफ़ है , मेरे अपने हैं वो मौन हैं 
उन्हें लगता है उनके शब्द  कहीं 
मुझसे छू कर संक्रमित न हो जाएँ 
उनके शब्द मेरे एहसास की हदों से टकरा कर 
अर्थहीन न हो जाएँ . 
लोग इतने निष्ठुर क्यों हो जाते हैं 
बरसों के रिश्ते बेमानी लगने लगते हैं 
क्या रिश्तों का मतलब 
ऐसी पार्टी और गेट टुग़ेदर करते रहना रह गया है 
जहां सारा ज़ोर खाने और 
उससे भी ज़्यादा पीने पर रहता है 
साथ ही वहाँ केवल उसी की निंदा होती है 
जो किसी वजह से आ नहीं पाता है , 
जहां ऐसे ऐसे जोक पर ठहाके लगाते रहना है 
जो वट्सअप पर पिछले कई महीने से घूम रहे हैं 
जिसे आप के कलीग, मित्र , रिश्तेदार 
पहले ही कई कई मर्तबा फ़ॉर्वर्ड कर चुके हैं .
मेरे सामने दो ही विकल्प बचे हैं , 
या तो अपने बनाए दायरे में ही क़ैद रहूँ
या फिर लोगों के तिलस्मी आचरण को 
सीधे सीधे नकार दूँ 
यह रचना इसी प्रक्रिया की शुरुआत है . 


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