Hindi Poetry : दोपहरी में उजाला न देख पाना
कितना अजीब सा लगता है
भरी दोपहरी में उजाला न महसूस करना
आपकी आँखों के सामने
पसर जाता है घुप्प अँधेरा सिर्फ अँधेरा
आपके लिए दुनिया का मतलब ही बदल जाता है
आप सिर्फ आप रह जाते हैं
आपके अपने केवल आवाज बन कर रह जाते हैं
आप फूल की खूबसूरती को देख नहीं सकते
बस उसे गंध या स्पर्श से पहचानने की कोशिश करते है
हवा की सरसराहट आप को छू कर निकल जाती है
बारिश आपके तन को भिगो कर चली जाती है
आप उसे देख नहीं देख नहीं सकते
कल तक जो आपके आराध्य की मूर्ति थी
जिस पर घंटों ध्यान लगाते थे
अपना आकार खो देती है.
बहुत मुश्किल है इस यातना से गुजरना .
-प्रदीप गुप्ता
भरी दोपहरी में उजाला न महसूस करना
आपकी आँखों के सामने
पसर जाता है घुप्प अँधेरा सिर्फ अँधेरा
आपके लिए दुनिया का मतलब ही बदल जाता है
आप सिर्फ आप रह जाते हैं
आपके अपने केवल आवाज बन कर रह जाते हैं
आप फूल की खूबसूरती को देख नहीं सकते
बस उसे गंध या स्पर्श से पहचानने की कोशिश करते है
हवा की सरसराहट आप को छू कर निकल जाती है
बारिश आपके तन को भिगो कर चली जाती है
आप उसे देख नहीं देख नहीं सकते
कल तक जो आपके आराध्य की मूर्ति थी
जिस पर घंटों ध्यान लगाते थे
अपना आकार खो देती है.
बहुत मुश्किल है इस यातना से गुजरना .
-प्रदीप गुप्ता
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