Baarish Kee Ghazal




इधर  बारिश थी  कहीं और रही  थी बदली 
मेरे जख्मों को छू  के जो वादे सबा निकली 

बेखुदी तेरे इश्क़ ने इतनी बढ़ा दी मेरी 
मिलना तुझ से था पहुँच गए गली अगली 

या खुदा जिंदगी किस मोड़ पे ले आयी है 
हर वक्त सताती हैं हमें यादें पिछली 

बदल के राह मुसाफिर ने मुंह मोड़ लिया 
इंतज़ार करते हुए थक गयी नदी पगली 

रात के अंधेरों ने जब भी हमें सताया है 
तेरी यादों ने बना दीं मेरी  रातें उजली 

                                                                  @प्रदीप गुप्ता 

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